हड़िंबा माता मंदिर में छड़ी फेंकने की परंपरा: आस्था, विश्वास और लोक-संस्कृति का अनोखा संगम
26.दिसंबर..मनाली स्थित प्रसिद्ध हड़िंबा माता मंदिर (धुंगरी मंदिर) में आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए एक दृश्य अक्सर कौतूहल पैदा करता है—लोग मंदिर परिसर में छड़ियाँ (लकड़ी की डंडियाँ) क्यों फेंकते हैं? यह परंपरा केवल एक अनोखा रिवाज नहीं, बल्कि सदियों पुरानी लोक-आस्था और सांस्कृतिक विश्वास से जुड़ी हुई है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, हड़िंबा माता महाभारत के वीर घटोत्कच की माता थीं और उन्हें हिमाचल क्षेत्र की रक्षक देवी माना जाता है। कुल्लू-मनाली के ग्रामीण समाज में यह विश्वास है कि छड़ी फेंकना शक्ति, सुरक्षा और कष्टों से मुक्ति का प्रतीक है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने या देवी का आशीर्वाद पाने के लिए मंदिर की ओर छड़ी अर्पित करते हैं।

एक लोककथा के अनुसार, प्राचीन समय में जंगलों और बाहरी खतरों से रक्षा के लिए लोग हाथ में डंडा रखते थे। हड़िंबा माता को योद्धा-स्वभाव की देवी माना जाता है, इसलिए छड़ी को शक्ति और रक्षा का प्रतीक मानते हुए देवी को अर्पित किया जाता है। यही कारण है कि आज भी यह परंपरा जीवित है।

विशेष रूप से दशहरा और स्थानीय मेलों के दौरान इस रिवाज को निभाने वालों की संख्या बढ़ जाती है। मंदिर परिसर में समय-समय पर जमा हुई छड़ियों को मंदिर प्रशासन द्वारा हटाया जाता है, ताकि परिसर की पवित्रता और व्यवस्था बनी रहे।
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि यह परंपरा हड़िंबा मंदिर की विशिष्ट पहचान बन चुकी है। देश-विदेश से आने वाले सैलानी न केवल इस रिवाज को देखते हैं, बल्कि इसके पीछे छिपी लोक-संस्कृति और विश्वास को समझने की कोशिश भी करते हैं।
इस तरह हड़िंबा माता मंदिर में छड़ी फेंकने की परंपरा आस्था, इतिहास और हिमाचल की लोक-परंपराओं का जीवंत उदाहरण है, जो आज भी श्रद्धालुओं को देवी से जोड़ती है।

