पापा की परी नहीं, परिवार की रीढ़ होती हैं ये बेटियाँ
11..jan..हर बेटी “पापा की परी” नहीं होती। कुछ बेटियाँ बचपन में ही परियों की दुनिया से बाहर आकर हकीकत की कठोर ज़मीन पर खड़ी हो जाती हैं। उनके कंधों पर गुड़ियों के बजाय जिम्मेदारियों का बोझ होता है, सपनों के बजाय घर चलाने की मजबूरी होती है। समाज अक्सर बेटियों को नाज़ुक, संरक्षण की मोहताज और सिर्फ प्यार पाने वाली के रूप में देखता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा कठोर और साहसी है।

ऐसी बेटियाँ सुबह सबसे पहले उठती हैं और रात में सबसे आख़िर में सोती हैं। पढ़ाई के साथ नौकरी, नौकरी के साथ घर के काम और घर के साथ छोटे भाई-बहनों की परवरिश—यह सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा होता है। कई बार पिता की बीमारी, माता की असहायता या आर्थिक तंगी उन्हें समय से पहले बड़ा बना देती है। वे अपने अरमानों को चुपचाप अलमारी में बंद कर देती हैं ताकि घर की ज़रूरतें पूरी हो सकें।

समाज तालियाँ अक्सर तब बजाता है जब बेटी “सफल” होती है, लेकिन उस संघर्ष को नज़रअंदाज़ कर देता है जो उसे वहां तक पहुंचाता है। ये बेटियाँ शिकायत नहीं करतीं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि अगर वे टूट गईं तो पूरा परिवार बिखर जाएगा। वे भावनात्मक सहारा भी होती हैं और आर्थिक स्तंभ भी।
अब वक्त है कि हम “पापा की परी” जैसे जुमलों से आगे बढ़ें और उन बेटियों को पहचान दें जो परिवार की असली ताकत हैं। उन्हें दया नहीं, सम्मान चाहिए; सहानुभूति नहीं, बराबरी चाहिए। क्योंकि कुछ बेटियाँ परियों जैसी नहीं होतीं—वे योद्धा होती हैं।

