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शीर्षक: मानवाधिकारों पर चयनात्मक संवेदनशीलता को लेकर उठे सवाल

25..दिसंबर..नई दिल्ली। हाल के दिनों में गाजा में जारी संघर्ष को लेकर देश के कई हिस्सों में कैंडल मार्च, प्रदर्शन और सोशल मीडिया अभियानों का आयोजन किया गया। इन आयोजनों में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और नागरिकों की मौत पर चिंता जताते हुए शांति की अपील की गई। हालांकि, इसी के साथ एक वर्ग ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या भारत और दुनिया भर में मानवाधिकारों को लेकर संवेदनशीलता समान रूप से दिखाई जाती है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि जब पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक हिंदुओं, विशेष रूप से दलित समुदाय के लोगों पर हमले होते हैं या उनकी हत्याएं होती हैं, तो उस स्तर की प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती जैसी गाजा जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर होती है। उनका आरोप है कि इन घटनाओं पर न तो बड़े स्तर पर कैंडल मार्च निकाले जाते हैं और न ही व्यापक सार्वजनिक बहस होती है।

मानवाधिकार मामलों पर काम करने वाले कुछ संगठनों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को वैश्विक मीडिया कवरेज अधिक मिलती है, जबकि पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दे अक्सर द्विपक्षीय राजनीति और कूटनीतिक संवेदनशीलताओं के कारण सीमित चर्चा तक ही रह जाते हैं। वहीं आलोचकों का कहना है कि यह चुप्पी पीड़ितों के साथ अन्याय है और मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता के सिद्धांत के खिलाफ जाती है।

इस बहस के बीच कई लोगों ने यह मांग उठाई है कि किसी भी समुदाय या देश के नागरिकों के खिलाफ होने वाली हिंसा की निंदा समान रूप से होनी चाहिए। उनका कहना है कि मानवाधिकार किसी धर्म, जाति या भूगोल से बंधे नहीं होते और संवेदनशीलता भी चयनात्मक नहीं होनी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की चर्चाएं समाज को आत्ममंथन का अवसर देती हैं और यह तय करने में मदद कर सकती हैं कि क्या वास्तव में हम सभी पीड़ितों की आवाज़ समान रूप से सुन रहे हैं या नहीं।

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