माता-पिता की अनदेखी: समाज की सबसे बड़ी भूल
आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में इंसान सफलता, पैसा और शोहरत की दौड़ में इतना आगे निकल गया है कि वह अपने ही घर की सबसे अनमोल दौलत—माता-पिता—को भूलता जा रहा है। “अपनी जिंदगी में कुछ करो या न करो, लेकिन अपने माता-पिता की कदर कर लो” यह पंक्ति आज के समाज के लिए एक कड़वा लेकिन सच्चा आईना है।
माता-पिता वे हैं जो बिना किसी स्वार्थ के हमें जन्म देते हैं, पालते हैं और अपने सपनों को हमारे भविष्य के लिए कुर्बान कर देते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, माता-पिता छोटे होते चले जाते हैं—सम्मान में, अधिकार में और भावनात्मक जुड़ाव में। आधुनिक जीवनशैली, मोबाइल फोन और व्यस्तता ने रिश्तों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है, जिसे हम रोज़ अनदेखा करते हैं।

समाज में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां बुज़ुर्ग माता-पिता उपेक्षा, तिरस्कार और अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस सच्चाई की गवाही देती है कि हम अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। माता-पिता का एक आँसू केवल भावनात्मक पीड़ा नहीं, बल्कि हमारी असफलता का प्रमाण है—एक ऐसी कीमत जिसे हम जीवन भर चुका नहीं सकते।
विशेषज्ञों का मानना है कि पारिवारिक संस्कारों की कमी और नैतिक शिक्षा का अभाव इस स्थिति को और गंभीर बना रहा है। अगर आज भी समय रहते नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ पछतावे की विरासत पाएंगी।
यह समाचार सिर्फ जानकारी नहीं, चेतावनी है। सफलता का असली मापदंड ऊंची इमारतें या मोटी तनख्वाह नहीं, बल्कि यह है कि हमारे माता-पिता हमारे साथ कितने सम्मान और सुकून से जी रहे हैं। माता-पिता की कदर करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारा नैतिक कर्तव्य है—आज नहीं तो कभी नहीं।

